साहित्य विमर्श प्रकाशन
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satyendra verma (verified owner) –
सुछन्दा डे का उपन्यास ‘ए ज़िंदगी’ 225 पन्नों में एक ऐसी प्रेमकथा कहता है, जिसकी शुरुआत एक दुर्घटना से होती है और आरंभिक मोड़ कुछ फिल्मी-सा लगता है। प्रथम पुरुष में कही गई यह कहानी नायिका की जुबानी आगे बढ़ती है, इसलिए पाठक घटनाओं को बाहर से देखने के बजाय उसके साथ-साथ जीता है। नायिका एक बड़े घर की, आधुनिक, पढ़ी-लिखी और संस्कारी लड़की है, लेकिन अपने रंग-रूप को लेकर उसके भीतर एक तरह की हीनभावना है। नायक के साथ रिश्ते के आगे बढ़ने पर उसके भीतर आत्मविश्वास लौटता है और उसके व्यक्तित्व में आने वाले बदलाव सहज लगते हैं। दूसरी ओर नायक का चरित्र भी धीरे-धीरे खुलता है—शुरुआत में अभावों में सब्जी बेचता दिखाई देने वाला युवक आगे चलकर अपनी शिक्षा, व्यक्तित्व और असल पहचान से पाठक को चौंकाता है। खास बात यह है कि शुरुआत में जो घटनाएँ कुछ अस्वाभाविक लगती हैं, कहानी के अंत तक उनका ऐसा स्वाभाविक औचित्य सामने आता है कि पीछे मुड़कर देखने पर वे अपनी जगह बिल्कुल सही बैठती हैं।
उपन्यास का एक खूबसूरत प्रयोग अध्यायों की शुरुआत में दिए गए छोटे-छोटे चित्र हैं, जो आने वाले प्रसंग का भाव एक दृश्य में सामने रख देते हैं। इन चित्रों के साथ हिंदी फिल्मी गीतों की पंक्तियों का इस्तेमाल कहानी को एक अलग स्वाद देता है। लेखिका ने केवल मुखड़ों तक ही खुद को सीमित नहीं रखा है, कहीं-कहीं अंतरे भी आए हैं और गीतों का चुनाव इतना सटीक है कि वे कहानी पर आरोपित नहीं लगते, बल्कि उसके साथ घुले-मिले महसूस होते हैं। नायिका का भावुक स्वभाव भी पूरे उपन्यास में लगातार महसूस होता है। प्रेम, रिश्ते और भावनाएँ उसके चरित्र का अभिन्न हिस्सा हैं। नायक-नायिका के बीच बनता रिश्ता और उनके जीवन में आने वाले बदलाव इसी भावभूमि पर आगे बढ़ते हैं। कहानी में कुछ प्रसंग भले ही पहली नजर में फिल्मी लगें, लेकिन लेखिका उन्हें अंत तक पहुँचते-पहुँचते अच्छी तरह साध लेती हैं।
‘ए ज़िंदगी’ ऐसी किताब नहीं लगती जिसे पढ़कर बार-बार उसी तरह पढ़ने की इच्छा हो, लेकिन इसकी अपनी एक खूबी है—यह पाठक को अंत में एक सुखद एहसास देकर छोड़ती है। इसकी तुलना उन अमोल पालेकर या ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों से की जा सकती है, जिन्हें आप जब भी देखें, मन में एक हल्की-सी खुशी और सुकून छोड़ जाती हैं। यह कहानी दुख के सागर में पाठक को डुबोकर नहीं छोड़ती, बल्कि भावनात्मक उतार-चढ़ाव के बाद एक हैप्पी एंडिंग तक ले जाती है। शायद इसी वजह से कुछ समय बाद अलमारी से यह किताब फिर निकल आए और मन करे कि इसके कुछ पन्ने दोबारा पलट लिए जाएँ। एक और बात उल्लेखनीय है कि लेखिका ने प्रकाशक के साथ मिलकर किताब खरीदने वाले पाठकों की प्रतिक्रिया जानने की पहल की है। लेखक और पाठक के बीच सीधे संवाद की यह कोशिश स्वागतयोग्य है।
deepa modi –
Awesome
deepa modi –
कुछ बाते और दिन यूही गुजर जाते हैं और इन्हीं यूँही गुजरते आम दिन कब खास बन जाते हैं पता ही नहीं चलता…एक ऐसे ही सफर पर हम मिले सुछंदा जी से और उनकी कहानी से मिलने पहुंचे । वही हमे ये मिले… एक टॉमबॉय सी लड़की और एक सीधा सादा सा लड़का, जिसके जीवन की एक छोटी सी भूल ने उसे जीवन के अनोखे रोलर कोस्टर में चढ़ा दिया।
बहुत खूबसूरत सफर बहुत खूबसूरत साथ और ये कहानी एक कप कॉफी और थोड़े सुकून के साथ अंत तक आपको बाँधे रखती है।
हाँ कही कही गुस्सा आएगा तो कही लाड तो कही बड़े की डाट और उनकी सजा में भी कितनी सच्चाई और अच्छाई छिपी होती है ये चलते सफर में पता चलता है। साथ ही माता पिता और छत का होना कितना जरूरी है ये भी समझ आता है।
अगर आप किसी के लिए है तो उसी समय बताए क्योंकि समय कही निकल न जाए।
सुछंदा जी की कहानियों में एक लय या प्रवाह नहीं दिखता बल्कि आप जीवन से लड़ते हुए पाए जाते है। हर मोड़ पर हर हाईवे पर और इसी के साथ लेखिका जी को बहुत सारा धन्यवाद और शुभेच्छा, राधे राधे 🙏🙏