
साहित्य विमर्श प्रकाशन
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बाग-ए-बहिश्त से हुक्म-ए-सफर दिया था क्यों,
कार-ए-जहाँ दराज है, अब मेरा इंतजार कर;
रोज-ए-हिसाब जब मेरा पेश हो दफ़्तर-ए-अलम,
आप भी शर्मसार हो, मुझ को भी शर्मसार कर।
एक सीस का मानवा
टॉप मिस्ट्री राइटर
सुरेन्द्र मोहन पाठक
की आत्मकथा का पांचवाँ और अंतिम खंड।
लेखक की आत्मकथा के पूर्वप्रकाशित
चार खंडों की जो पठनीयता स्थापित है,
वो अब अपने चरम पर।
साहित्य विमर्श प्रकाशन
की संग्रहणीय प्रस्तुति