साहित्य विमर्श प्रकाशन
Original price was: ₹249.₹199Current price is: ₹199. (-20%)
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The Civil Serpents | द सिविल सरपेंट्स
श्री विनय प्रकाश तिर्की की यह कृति केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक तंत्र का आईना है, जिसकी आत्मा लालफीताशाही में उलझी हुई है और जिसकी रगों में विश्वासघात का ज़हर बहता है। यह कथा उन अदृश्य जालों को उजागर करती है, जहाँ सहयोग की आड़ में धोखे की साँसें चलती हैं और हर मुस्कान के पीछे छुपा होता है एक फनधारी इरादा।
इस व्यवस्था में व्यक्ति कब अपने ही सहकर्मियों द्वारा छल लिया जाता है, उसे आभास तक नहीं होता। ऊँचे ओहदों पर बैठे अधिकारी, अपने नीचे काम करने वालों का शोषण ऐसे करते हैं जैसे वन का कोई विषधर अपने शिकार को निगलता है- धीरे, सधे हुए अंदाज़ में।
लेखक स्वयं नागलोक कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ के जशपुर अंचल से हैं—एक ऐसा क्षेत्र जहाँ साँपों की अनगिनत प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इन वनों में साँपों से हुई उनकी मुठभेड़ों ने उन्हें सिखाया कि असली विषधर केवल जंगलों में ही नहीं, बल्कि सभ्यता की चादर ओढ़े शहरों में भी पाए जाते हैं- कंक्रीट के इस जंगल में वे मनुष्य का मुखौटा पहन कर विचरण करते हैं।
इच्छाधारी नाग या नागिन चाहे कल्पना मात्र हों, किंतु इस ‘सिस्टम’ के साँप उनसे कहीं अधिक चतुर, घातक और जीवित हैं। उनका धोखा, उनकी दोहरी ज़ुबान और विषैली चुप्पी, इस संघर्षशील प्रशासनिक जीवन की अनिवार्यता बन चुकी है।
यह पुस्तक एक चेतावनी है, एक दर्शन है—’सिविल सर्पेंट सिस्टम’ का। लेखक की विशिष्ट और व्यंग्यपूर्ण लेखन शैली इसे केवल पढ़ने योग्य नहीं, बल्कि महसूस करने योग्य बनाती है- मानव और नाग के बीच की पतली रेखा को पाठक स्वयं पहचानने लगते हैं।
| Weight | 250 g |
|---|---|
| Dimensions | 22 × 17 × 2 cm |
| फॉर्मैट | पेपरबैक |
| भाषा | हिंदी |
| Number of Pages | 200 |
The Civil Serpents (Hindi)


Prabhat Datta Jha –
पुस्तक के बारे में
श्री विनय प्रकाश तिर्की जी की नई हिंदी पुस्तक “दि सिविल सर्पेन्ट्स”, साहित्य विमर्श प्रकाशन, गुड़गांव द्वारा प्रकाशित, निश्चित ही आज के सामाजिक और प्रशासनिक परिदृश्य को अद्भुत गहराई से उजागर करती है। वे अपनी पहचान को सिर्फ सरकारी पद या अधिकार तक सीमित नहीं रखते, बल्कि लेखन का संसार उनकी असली आत्मा और स्वरूप को अभिव्यक्त करता है। इस पुस्तक की सबसे बड़ी ताकत यही है कि लेखक ने अपने अनुभवों को केवल “रिपोर्टिंग” के रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि हर शब्द में संवेदनाओं की लगन और गहराई पूरी ईमानदारी से उतारी है।
किताब की शैली सहज, सरल और शालीन है—फिर भी पृष्ठ दर पृष्ठ एक फुंफकारता सा आक्रोश महसूस होता है, जो सत्ता की राजनीति और अतृप्त समाज का प्रतीक बना रहता है। लेखन में निडरता और अपने जीवन के भीतर तक जाने की हिम्मत साफ झलकती है। अंग्रेजी संस्करण “The Civil Serpents” को पढ़ने पर भी यह स्पष्ट दिखता है कि तिर्की जी ने अनुभवों को न सिर्फ देखा है, बल्कि पूरी तरह जिया है। हिंदी संस्करण के लिए तो मित्र तिर्की जी को अतिरिक्त बधाई बनती है, क्योंकि अपनी भाषा में कहने की जोखिम और ईमानदार अभिव्यक्ति कई गुना संवेदनशील हो जाती है।
पाठकों को पुस्तक निश्चित ही आनंदित करेगी और लेखक की हिम्मत, सोच तथा लेखकीय ईमानदारी को भरपूर सहयोग मिलेगा। ऐसा लगता है, उनके पिटारे में अभी कई सांप बाकी हैं, जिनके जहरीले दांत निकाल दिए गए हैं और जिनकी फुफकार आने वाली है! तिर्की जी की लेखनी को सलाम, शुभकामनाएँ और भरपूर साधुवाद।
– प्रभात दत्त झा,
बिलासपुर