क्या हो अगर आपकी लिखी हुई कहानी का कोई पात्र साक्षात आपके सामने आ खड़ा हो जाए? और अगर वह पात्र साधारण न होकर महाशक्तिशाली खलनायक हो तो? दुर्भागा (Durbhaga) इसी भयावह और रोमांचकारी प्रश्न से जन्मा उपन्यास है।
यह कथा पारंपरिक कल्पना और ठोस यथार्थ के बीच की पर्तों को झकझोरती है। लेखक ने अपनी कहानी में एक तांत्रिक खलनायक रचा — अंधकारमय, शक्तिशाली और कथा को दिशा देने वाला। पर धीरे-धीरे वह पात्र कल्पना की दीवारें तोड़कर वास्तविकता में उतर आता है और कहानी का नियंत्रण लेखक के हाथों से छीन लेता है। उसी क्षण बाकी पात्र भी अपनी-अपनी इच्छाओं और स्वभाव के साथ स्वतंत्र हो जाते हैं, और लेखक केवल असहाय दर्शक बनकर यह देखता रहता है कि उसकी गढ़ी दुनिया किस तरह विनाश की ओर बढ़ रही है।
Reviews
There are no reviews yet