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Iss Paar Main इस पार मैं – पता नही क्यों सारे भराव के बावजूद कुछ खाली-खाली-सा हमेशा साथ ही रहा मेरे। जो तमाम कोश़िश़ों के बाद भी ख़न-ख़न करने से बाज़ नही आता है। इस ख़ालीपन की आवाज़ से बेतरहा ख़ौफ आता रहा है मुझे।उससे पार पाने के लिये मैं उससे ही बातें करने लगती हूँ। शायद उसे पलटकर डराने के लिहाज़ से या शायद अपने डर से पिंड छुड़ाने की बाबत, और यहीं मैं अपनी कमजोर नस उसे थमा देती हूँ।
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