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Pahighar | पाहीघर
‘पाहीघर’ अवध के एक गाँव, ख़ासकर एक परिवार के इर्द-गिर्द बुनी गई कथा के साथ-साथ सन् 1857 के उस तूफ़ान की इतिहास-कथा भी है जिसके थपेड़ों से अवध का मध्ययुगीन ढाँचा पूरी तरह चरमरा उठा। एक ओर इसमें तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था का विवरण है तो दूसरी ओर अंग्रेज़ों के भारत में पैर जमाने के पीछे के कारणों पर लेखक की वस्तुपरक दृष्टि और पैनी सोच की भी झलक है।
यह उपन्यास तत्कालीन समाज की विसंगतियों और अन्तर्द्वन्द्व का भी दर्पण है, जिसके कारण कल और आज में कोई तात्त्विक फ़र्क़ नहीं दिखता। साम्प्रदायिक और जातीय तनाव पैदा कर राजनीति करनेवाले तब भी थे और आज भी हैं, बस फ़र्क़ यह है कि उनके मुखौटे बदल गए हैं। उस वक़्त यह काम विदेशी करवाते थे और अब यही काम देशी चरित्र करा रहे हैं।
वस्तुतः ‘पाहीघर’ की कथा एक बहुआयामी अनुभव की धरोहर की दस्तावेज़ है, जो अपनी अन्तर्धारा के व्यापक फैलाव के चलते किसी स्थान या काल विशेष की परिधि में बँधना अस्वीकार कर जाती है।
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