वह लोगों के लिए एक पहेली थी। कोई नहीं जानता था कि वह कहाँ रहती थी और कैसे जीवन-यापन करती थी। न तो वह दिन के उजाले में दिखती थी और न ही रात के अँधेरे में। उसके दिखने का जो वक्त मुक़र्रर था, वह पूर्णमासी की रात थी और जो स्थान मुक़र्रर था, वह यक्षिणी-मंदिर का तालाब था। उस रहस्यमयी औरत की हैरतअंगेज दास्तान, जिसकी निगाहों का मारा मौत का मुसाफ़िर बन जाता था।
पढ़ें चंद्र प्रकाश पांडेय का उपन्यास रक्ततृष्णा (Rakttrishna)।
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