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चार लड़कियों को फिल्मों में काम देने का झांसा देकर पटना से मुंबई पहुंचा दिया गया। चारों ही बेहद मामूली लड़कियां थीं इसलिए उनके गायब होने पर कोई बड़ा हंगामा होने की जरा भी आशंका नहीं थी। मगर हंगामा बरप कर रहा क्योंकि उनमें से एक का भाई जयशंकर शुक्ला फौजी था, ऐसा फौजी जिसे उसके साथी सनकी समझते थे। मुकाबला एक और सौ के बीच का था, मगर उन सौ लोगों के लिए शुक्ला विध्वंसक बन गया। ऐसा विध्वंसक जिसने उनकी सल्तनत को पूरी तरह बर्बाद कर दिया, मगर बहन के साथ घटित हुई घटना के सच से वह अभी भी कोसों दूर था। वह भटक रहा था, तड़प रहा था, मारा मारा फिर रहा था ये जानने के लिए कि उसकी बहन के साथ क्या हुआ था। फिर सामने आया एक ऐसा सच जिसने शुक्ला के साथ-साथ पुलिस के भी होश उड़ाकर रख दिये।
लेखक संतोष पाठक का जन्म 19 जुलाई 1978 को, उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले के बेटाबर खूर्द गाँव में एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा गाँव से पूरी करने के बाद वर्ष 1987 में आप अपने पिता श्री ओमप्रकाश पाठक और माता श्रीमती उर्मिला पाठक के साथ दिल्ली चले गये,। जहाँ से आपने उच्च शिक्षा हासिल की।
आपकी पहली रचना वर्ष 1998 में मशहूर हिन्दी अखबार नवभारत टाइम्स में प्रकाशित हुई, जिसके बाद आपने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। वर्ष 2004 में आपको हिन्दी अकादमी द्वारा उत्कृष्ट लेखन के लिए पुरस्कृत किया गया। आपने सच्चे किस्से, सस्पेंस कहानियाँ, मनोरम कहानियाँ इत्यादि पत्रिकाओं तथा शैक्षिक किताबों का सालों तक सम्पादन किया है। आपने हिन्दी अखबारों के लिए न्यूज रिपोर्टिंग करने के अलावा सैकड़ों की तादाद में सत्यकथाएँ तथा फिक्शन लिखे हैं।
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